मै, चाय और चांद

मै, चाय और चांद
कुछ इस कदर बाते किया करतें है
मानो दोस्तो की वो टोली हो जो सालो से ना मिली हो...

चांद के साथ चाय का स्वाद थोड़ा और उभर जाता है
उसकी हल्की सी रोशनी में मन मोह सा जाता है
और ये मन ..एक बार फिर कहीं खो जाता है...

मेरी कभी ना ख़तम होने वाली बातों पर एक विराम सा लग जाता है
चांद का वो उजाला जब  नयन तलक आता है
इतनी दूर होकर भी वो बहुत पास नजर आता है
और ये मन...एक बार फिर खो जाता है...

उसकी कमियो को तराशना जैसे आदत है मेरी
और मुझे बिन टोके सुनते रहना,उसकी
जानती हूं...
बहुत जुदा है हम
पर उतना ही खास भी है वो..
मेरी अकेली रातो का साथ भी है वो...

नजाने क्यों
कभी थकती नहीं मै उसके लिए लिख कर 
बस लिखती चली जाती हूं...

क्युकी जितना दूर और खूबसूरत है 
उतना ही पास भी है वो..
मेरी इन कविताओं का आगाज़ भी है वो...।।
           -Lubaina surury

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